गोविंद सिंह

गोविंद सिंह
धरती : पहले शोषण फिर संरक्षण
Posted on 14 Mar, 2014 09:46 AM
वैदिक काल के मनुष्य में जितनी आस्था सूर्य के प्रति थी, उससे कम धरती
धरती
जलते पहाड़
Posted on 27 Jun, 2012 09:50 AM
उत्तराखंड के पहाड़ों में फिर आग लगी है। रानीखेत, कौसानी, बागेश्वर में इस समय ठंडी बयार की जगह धुआं और बदबुदार हवा नसीब हो रही है। देखने में यह आया है कि जंगलो की आग का क्षेत्रफल बढ़ा है और बारम्बारता बढ़ी है। सरकारी उदासीनता और वन माफियाओं ने जंगल की आग को और भयावह बना दिया है, बता रहे हैं गोविंद सिंह।
जलते पहाड़
गौला नदी का दर्द
Posted on 15 Mar, 2012 12:45 PM

हल्द्वानी पहुंचकर गौला नदी अस्तित्वहीन सी लगने लगती है। बस, रेता-बजरी की खान से अधिक कुछ नहीं। नदी तो बस पतली-सी जलधारा रह जाती है। इसकी छाती पर सवार सैकड़ों ट्रक व डंपर इसके अक्षय उदर से रेत और बजरी निकाल शहरों की जरूरतें पूरी करते हैं। जहां ऐसी रेतदायिनी नदियां नहीं होती होंगी, वहां लोग घर कैसे बनाते होंगे?

गौला नदी
कोपेनहेगन यानी एक नाटक
Posted on 14 Dec, 2009 10:06 AM

ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए क्या हम अपनी सुविधाओं में कटौती को तैयार हैं

देश की माटी देश का जल/हवा देश की देश के फल
सरस बनें प्रभु सरस बनें/देश के घर और देश के घाट
देश के वन और देश के बाट/सरल बनें प्रभु सरल बनें
देश के तन और देश के मन/देश के घर के भाई-बहन
विमल बनें प्रभु विमल बनें

COP14
उत्तराखंड के नवनिर्माण में मीडिया की भूमिका
Posted on 10 Jun, 2014 03:21 PM
पहाड़ के जो हित हैं या फिर इकोलाॅजी, संस्कृति और पर्यावरण से जुड़े
उत्तराखण्ड
पानी के लिए ...
Posted on 15 May, 2010 07:57 AM

पिछले दिनों जब पश्चिम एशिया की धरती युद्ध की विभीषिका से लहूलुहान हुई थी तभी यह जुमला भी सामने आया था कि आज तो यह लड़ाई तेल के लिए हो रही है, लेकिन कल इससे भी भयावह लड़ाई पानी के लिए होगी। पानी न सिर्फ आदमी के जीने की पहली शर्त है, बल्कि आज वह एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय हथियार भी है। धरती पर से पानी बूँद-बूँद कम होता जा रहा है और आदमी है कि अपने पारंपरिक जलस्रोतों को मिटाता जा रहा है।

पहाड़ों में गर्मियों में एक पक्षी की दर्दभरी आवाज सुनाई पड़ती है- ‘कुकुल दीदी- पान! पान!!’ चील जैसे इस पक्षी को कुमाऊँनी में ‘कुकुल दीदी’ कहते हैं। इसके बारे में एक लोककथा प्रचलित है कि जब सीता की प्यास बुझाने के लिए राम पानी की तलाश में निकले तो उन्होंने कुकुल दीदी से भी पानी के बारे में पूछा। जानबूझ कर कुकुल दीदी ने उन्हें पानी का ठिकाना नहीं बताया। राम ने क्रोध में आकर उसे श्राप दिया कि तुझे धरती में बहता हुआ पानी खून जैसा दिखे और तू पानी के लिए तरसती रहे। कलकल-छलछल बहते पहाड़ी नदी-नालों के बावजूद कुकुल दीदी ‘पान-पान’
जल
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